भक्त मंडली

सोमवार, 3 जून 2013

चुभन में भी मिठास है

Sita : Rama and Sita  

शूल बने फूल हैं , चुभन में भी  मिठास है ,
है मुदित ह्रदय मेरा , मिला प्रभु का साथ है !



जिस शीश सजना किरीट था उस शीश पर जटा बंधी 
चौदह बरस वनवास पर चले प्रिय महारथी  ,
 मैं भी चली उस पथ पे ही जिस पथ पे प्राणनाथ हैं !
है मुदित ह्रदय मेरा , मिला प्रभु का साथ है !



ये है मेरा सौभाग्य  श्री राम की दासी हूँ मैं ,
प्रिय हैं मेरे अमृत सदृश कंठ तक प्यासी हूँ मैं ,
जन्मों-जन्मों के लिए थामा प्रभु का हाथ है !
है मुदित ह्रदय मेरा , मिला प्रभु का साथ है !



वन वन प्रभु के संग चल चौदह बरस कट जायेंगें ,
भैया लखन को साथ ले वापस अयोध्या आयेंगें ,
होगी सनाथ फिर प्रजा जो हो रही अनाथ है !
है मुदित ह्रदय मेरा , मिला प्रभु का साथ है !


शिखा कौशिक 'नूतन '

सोमवार, 20 मई 2013

जनकनंदनी की महिमा का आओ हम गुणगान करें !



जानकी जयंती [१९ मई २०१३ ]पर विशेष 


जनकनंदनी  की महिमा का आओ हम गुणगान करें !
श्री राम की प्राण प्रिया के चरणों में निज शीश धरें !!



बड़े भाग मिथिला पति के सीता सम पुत्री पाई ,
सुनयना की शिक्षा जिसने पल भर को न बिसराई ,
त्याग-तपस्या की मूर्ति जानकी का  हम ध्यान करें !
श्री राम की प्राण प्रिया के चरणों में निज शीश धरें !!

  

कुल वधू राजा दशरथ की सिया कौशल्या को प्यारी ,
श्री राम संग झेली वनवास -विपत्ति भारी ,
पतिव्रता जगदम्बा ने निज सुख सारे बलिदान किये !
श्री राम की प्राण प्रिया के चरणों में निज शीश धरें !!



दिया राम ने त्याग सिया को प्रजा में जब अपवाद उठा ,
कुटिल दैव की इस करनी से सिया का यश था नहीं घटा ,
लव-कुश की पावन माता का ह्रदय से हम सम्मान करें !
श्री राम की प्राण प्रिया के चरणों में निज शीश धरें !!




    

पुत्री ,पत्नी , माता धर्म निभाया जिसने दृढ होकर ,
सिया चरित आदर्श यही सन्देश मैं आई हूँ लेकर ,
भारत की इस नारी पर आओ मिलकर अभिमान करें !
श्री राम की प्राण प्रिया के चरणों में निज शीश धरें !!

शिखा कौशिक 'नूतन'





रविवार, 21 अप्रैल 2013

'हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है '

'हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है '


हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है ,
मीठी निंदिया के अर्णव में खुद को डुबोता है .
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

मखमल सा कोमल है लल्ला नाम है इसका राम ,
मैं कौशल्या वारी जाऊं सुत मेरा  भगवान ,
ऐसा सुत पाकर हर्षित मेरा मन होता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

मुख की शोभा देख राम की चन्द्र भी है शर्माता ,
मारे शर्म के हाय ! घटा में जाकर है छिप जाता ,
फिर चुपके से मुख दर्शन कर धीरज खोता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

स्वप्न अनेकों देख रहा है सुत मेरा निंद्रा में ,
अधरों पर मुस्कान झलकती राम के क्षण क्षण में ,
मधुर स्वप्न के पुष्पों को माला में पिरोता है !
हौले हौले बह समीर मेरा लल्ला सोता है !

शिखा कौशिक 'नूतन'
मौलिक व् अप्रकाशित 
 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

! रामनवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

! रामनवमी पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !
किलकारी मारें बजाकर खन खन कंगना ,
नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !


मैय्या कौशल्या उर आनंद लहरे उमड़े ,
पैय्या चले तो पकड़ने को वे दौड़े ,
लेती बलैय्या आँचल में हैं छिपती ललना !
नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

चारों भैय्या मिलकर माखन चुराते हैं ,
बड़े हैं भाई राम सबको खिलाते हैं ,
माटी के बर्तन फोड़ें आये पकड़ में ना !
 नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

राम के मुख की शोभा बरनि न जाये है ,
सुन्दरता देख उन्हें खुद पर लजाये है ,
शोभा की खान राम किसी से क्या तुलना !
 नन्हें से राम लल्ला खेलें  दशरथ के अंगना !

            शिखा कौशिक 'नूतन '

ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

 
हे लक्ष्मण तू बड़भागा है श्री राम शरण में रहता है ,
ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

प्रभु इच्छा से ही संभव है प्रभु सेवा का अवसर मिलना ,
हैं पुण्य प्रताप तेरे लक्ष्मण प्रभु सेवा अमृत फल चखना ,
मेरा उर व्यथित होकर के क्षण क्षण ये मुझसे कहता है !
ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

 कैकेयीनंदन होने का महा कलंक  मुझ पर है लगा ,
पर ह्रदय साक्षी मेरा है 'श्री राम से बढ़कर नहीं सगा ',
ह्रदय व्यथा ही प्रकट करता जब नयन से अश्रु बहता है !

 ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

 मैं चित्रकूट में आया था प्रभु को लौटा ले जाऊंगा ,
निज-निज धर्म बना बेडी अब चौदह बरस निभाऊंगा,
प्रभु -पादुका शीश पे धर प्रभु के अधीन हो लेता है !
ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

राज हो वनवास हो सीता सदा श्री राम संग !

 

 हूँ जनक की नन्दनी श्री राम की दासी हूँ मैं ,
स्वामी चले वनवास को छोड़ सब सुख -रास-रंग !


ज्यूँ चुभा कंटक कोई रुकता न पग बढती उमंग ,
राज हो वनवास हो मैं सदा श्री राम संग !


उर में मेरे उल्लास है कि मैं प्रिय के साथ हूँ ,
जब भी उन्हें निहारती मन में उठे अद्भुत तरंग !


कैसे रुकूँ  महलों में अब जाना प्रिय के साथ है ,
सीता के सर्वस्व हैं जब से किया शिव-धनुष-भंग !




सिया-राम दोनों एक हैं मैं देह हूँ वे प्राण हैं ,
है मिलन अपना अटल ज्यों पुष्प में व्यापी सुगंध !

 
      शिखा कौशिक 'नूतन '




शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013